जन जागरण प्रकृति संरक्षण का सबसे बड़ा माध्यम -मांगेराम चौहान
प्रकृति के साथ खिलवाड़ का परिणाम है जल संकट की भयावहता -ज्ञानेन्द्र रावत
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बल्लभगढ़। बीती 22 मार्च को बल्लभगढ़ स्थित बालाजी फार्मेसी कालेज के डा एसएन सुब्बाराव सभागार में विश्व जल दिवस के अवसर पर जल विमर्श एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। समारोह में देश के जाने-माने पर्यावरण विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों,पर्यावरण, जल संरक्षण व वन्यजीव संरक्षण कार्यकर्ताओं ने भाग लिया और जल संकट के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे। दरअसल इस जल मंथन एवं सम्मान समारोह का शुभारंभ अतिथियों द्वारा सबसे पहले मां सरस्वती की प्रतिमा पर दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके उपरांत सबसे पहले उत्तराखंड के पौढी़ जिले के पूर्व सैनिक पर्यावरण कार्यकर्ता रमेश बौडाई ने हिमालय की तबाही, विकास के नामपर लाखों पेड़ों के बलिदान के दुष्परिणाम की चर्चा की व जल संरक्षण में पेड़ों की भूमिका, उनके महत्व व संरक्षण की अपील की। पर्यावरणविद संजय राणा जी ने जल संरक्षण अभियान की शुरूआत का वर्णन करते हुए सैकड़ों स्कूलों के 10,000 विद्यार्थियों को जल एवं पर्यावरण संरक्षण हेतु शिक्षित किए जाने और नदी -जल के प्रदूषण खत्म करने हेतु किए जाने वाले घोटालों का सिलसिलेवार व्योरा दिया और इस हेतु जनजागरण पर बल दिया। उनका मानना था कि इस अभियान में बच्चों की भूमिका के बिना कामयाबी बेमानी है। चर्चित जैन फाउण्डेशन के प्रमुख नीरज जैन ने अपने पर्यावरण संरक्षण कार्य का सिलसिलेवार वर्णन करते हुए व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण करने और परंपराओं के नाम पर प्रदूषण न करने का आह्वान किया। 100 करोड़ वृक्ष रोपण अभियान के शीर्ष स्तंभ आशीष शर्मा व गगनदीप सिंह ने अधिक से अधिक वृक्षारोपण किए जाने व जल के अपव्यय न करने का संकल्प लेने का आह्वान किया। यमुना संरक्षण से जुड़े अशोक उपाध्याय ने कहा कि नदी संरक्षण के काम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों को सफल बनायें। अलवर से आये पर्यावरण विद राम भरोस मीणा ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण में सबसे बड़ी बाधा पेड़ों का कटान है जिसे बचाना बेहद जरूरी है। कारण पेड़ बचेंगे तो पर्यावरण बचेगा। इस दृष्टि से हमारे द्वारा शुरू जीवन जतन आजीविका बचाओ यात्रा महती भूमिका निर्वहन करेगी। इस दिशा में हमें सबसे पहले अपने परंपरागत जल स्रोतों का संरक्षण करना होगा वन्य एवं प्राणी संरक्षण से जुड़ी पर्यावरणविद राधिका भगत ने भारतीय संस्कृति, परंपराओं का हवाला देते हुए जीवन में वन्य जीवों और प्राणी संरक्षण की दिशा में अपनी भूमिका के निर्वहन पर बल दिया और दुख व्यक्त किया कि आखिर हम इस जरूरत पर मौन क्यों हैं? इसलिए अब जागरुक होने का समय है अन्यथा दुनिया तबाह हो जायेगी। पक्षी प्रेमी टी के राय ने जीवन में पक्षी और प्रकृति के महत्व पर प्रकाश डाला और इनके संरक्षण पर बल दिया।
कचरा प्रबंधन में विशेषज्ञता प्राप्त शैली अग्रवाल ने जल संरक्षण की दिशा में अपने व्यक्तिगत व सामूहिक प्रयासों के बारे में सिलसिलेवार जानकारी दी और कहा कि जल हमारे जीवन का अभिन्न अंग है जिस पर समूचा प्राणी-जीव जगत ज़िंदा है। इसलिए इसके संरक्षण की बहुत जरूरत है। यह हम सबके प्रयास से ही संभव है। इसके साथ कचरा प्रबंधन समय की मांग है जिसका हमारे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। जल प्रदूषण में कचरे की अहम भूमिका है। इसका हमें विशेष ध्यान रखना होगा और इसका उचित प्रबंधन हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए । यदि इसमें रसोई से हम शुरूआत करें तो हमें काफी कामयाबी मिलेगी।
समारोह में पर्यावरणविद, लेखक प्रशांत सिन्हा ने भी पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, वृक्षारोपण और देश के विभिन्न नगरों में पचास-पचास पेड़ों के रोपण करने और उनके संवर्धन -संरक्षण के प्रयासों की विस्तृत जानकारी दी। समारोह की विशिष्टता यह रही कि उपरोक्त के अलावा हरियाणा के पूर्व अधीक्षण अभियंता शिव सिंह रावत, शिक्षाविद डा अरविंद गुप्ता, राकेश नैथानी, ट्रैफिक गुरू विरेन्द्र बलहारा, रामकुमार बघेल, संदीप कुमार,अनिल महाशय, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो चंद्र प्रकाश,लोकनायक जयप्रकाश अध्ययन विकास केन्द्र के महासचिव अभय सिन्हा, प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता हरपाल राणा एवं संजय मोंगा, डा राधेश्याम, जगदीश सहगल, एसपी मलिक, विनय खरे, टी के राय, उत्तर प्रदेश से आये सर्व सेवा संघ के महासचिव एवं जल बिरादरी के उप्र के प्रमुख रहे भाई अरविंद कुशवाहा, बांदा के पीपल मैन डा आर पी सिंह, प्रताप सिंह, सर्वोदय कार्यकर्ता एवं जलयोद्धा ईश्वर भाई, जया श्रीवास्तव, श्रुति श्रीवास्तव सहित बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान व उत्तराखंड के लगभग 19-20 कार्यकर्ताओं ने न केवल अपने अनुभव साझा किये बल्कि जल संरक्षण हेतु अपने सुझाव भी दिये।
इस दौरान समारोह के विशिष्ट अतिथि बरेली के हाउसिंग बोर्ड के डिप्टी कमिश्नर और जाने-माने पर्यावरण प्रेमी मांगेराम चौहान ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने किस प्रकार पौधारोपण के माध्यम से मानवीय हिंसा को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में मोड़ने का काम किया। इसका सुफल 20 हजार पौधारोपण कर हरित वातावरण बनाने के रूप में सामने आया। उनका मानना है कि जागरण ही प्रकृति संरक्षण और मानव जीवन में बदलाव का सबसे बड़ा माध्यम है।
मुख्य अतिथि पद्मश्री उमाशंकर पाण्डेय ने कहा कि जल संकट की गंभीरता का सबसे बड़ा ज्वलंत प्रमाण आजकल 20 से लेकर 1000 रुपये तक बाजार में बिक रही पानी की बोतलें हैं। इन्हें खरीदने पर हम मजबूर हैं। कारण यह सब हमारे द्वारा जल संचय की उपेक्षा, न्यूनतम उपयोग की सदियों पुरानी परंपरा की अवहेलना और जल के अपव्यय का प्रमाण है। आज जरूरत इस बात की है कि देश में जल विश्व विद्यालय की स्थापना हो। उसमें जल शिक्षण हो, विमर्श हो और जल संरक्षण व जल संचय की विधायक का पठन-पाठन हो। तभी जनक्रांति संभव है। आयोजक गिफ्ट के अध्यक्ष व विश्व जल परिषद के सदस्य डा जगदीश चौधरी ने कहा कि आज का दिन संकल्प का दिन है। हमारा देश दुनिया में सबसे ज्यादा नदियों से परिपूर्ण है लेकिन दुख है कि हम शुद्ध पानी के मामले में उत्पन्न संकट से जूझ रहे हैं। यह सब हमारे भौतिकवादी सोच,पुरानी परंपराओं की उपेक्षा और जीवनशैली में आये बदलाव का प्रतीक है। जल के प्रति अपनी सोच में बदलाव के बिना इस संकट से छुटकारा आसान नहीं है। समारोह में मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, अध्यक्ष व आयोजक ने 51 पर्यावरण कार्यकर्ताओं,जल योद्धाओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिनोबा भावे स्मृति राष्ट्र रत्न सम्मान, बाबा आमटे स्मृति समाज रत्न सम्मान, सुन्दर लाल बहुगुणा स्मृति पर्यावरण योद्धा सम्मान,वृक्ष मित्र सम्मान व अनुपम मिश्र स्मृति पर्यावरण रत्न सम्मान से सम्मानित किया।
समारोह के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद ज्ञानेन्द्र रावत ने अपने संबोधन में इस पुनीत एवं पावन आयोजन हेतु विश्व जल परिषद के सदस्य व ग्रीन इंडिया फाउण्डेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष पर्यावरणविद डा जगदीश चौधरी को बधाई देते हुए सभी उपस्थित अतिथियों, पर्यावरण योद्धा, जल संरक्षण व वन्य जीव कार्यकर्ताओं का आभार व्यक्त किया और कहा कि जल संकट का निदान मौजूदा समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। क्योंकि इसका प्राणी मात्र के जीवन-मरण से सीधा सम्बन्ध है। हमने प्रकृति के साथ अपने स्वार्थ के चलते जो खिलवाड़ किया है, यह उसी का परिणाम है। जल रहेगा तो हम रहेंगे अन्यथा मानव सभ्यता बची रह पायेगी, इसकी संभावना, कल्पना और आशा ही बेमानी है। इसलिए संकल्प लो कि हम पेड़ बचायेंगे, जल की बर्बादी नहीं करेंगे, जल संचय करेंगे और सदियों से जारी जल संस्कृति - जल परंपराओं का सम्मान करेंगे और जल को आस्था से जोड़ जल स्रोतों की रक्षा करेंगे। यही आज के इस जल विमर्श कार्यक्रम का पाथेय है। तभी हम कल के लिए जल को सुरक्षित रख पाने में समर्थ होंगे