लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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दक्षिण के राज्य केरल में विधानसभा चुनाव अगले साल होने है। लेकिन बीजेपी ने इस राज्य में चुनाव लड़ने के रणनीति अभी से बनाना शुरु कर दी है। हालाँकि इसके नेता जानते हैं कि पार्टी निकट भविष्य में यहाँ सत्ता में नहीं आ सकती इसलिए अभी यहाँ दो मोर्चों की ध्रुवीकरण वाली राजनीति में कम से कम एक तीसरा विकल्प तो बन ही सकती है। बीजेपी के शीर्ष नेता इसी बिंदु को सामने रख कर चुनावों की तैयारी करने में लगे है। विधानसभा के चुनाव तो अगले साल होने है लेकिन उससे पहले इसी वर्ष अक्तूबर में यहाँ स्थानीय निकायों के चुनाव होने है। अगर पिछले कुछ स्थानीय निकायों के चुनावों को देखा जाये तो बीजेपी अच्छी खासी सीटें जीतती रही है। लेकिन विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में यह कुछ खास नहीं कर सकी। इसे स्थानीय निकायों में अच्छे खासे वोट मिले लेकिन ऐसा न तो विधानसभा चुनावों में हुआ और ना ही लोकसभा चुनावों में।
लेकिन पिछले लोकसभा चुनावों में यह न केवल एक लोकसभा सीट जीती बल्कि 12 विधासभा क्षेत्रों में इसके लोकसभा उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे. इन लोकसभा चुनावों में पार्टी को कुल 19 प्रतिशत वोट मिले जब कि 2021 के विधानसभा चुनावों में इसे 12 प्रतिशत वोट ही मिले थे. यह अलग बात है कि पार्टी एक भी विधानसभा क्षेत्र में जीत दर्ज नहीं कर सकी .
लोकसभा के चुनावों में सबसे दिलचस्प मुकाबला राज्य की राजधानी तिरूवनतपुरम सीट पर था। इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने अपने बड़े नेता तथा पार्टी केंद्रीय कार्यसमिति के सदस्य शशि थरूर को मैदान में उतारा था। वे पिछले तीन लोकसभा चुनाव यही से जीते थे। उनकी जीत का अंतर लाखों में था। बीजेपी ने इस बार उस समय केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर को मैदान में उतारा,वे तीन बार राज्य सभा के सदस्य रहे लेकिन यह उनका पहला लोकसभा चुनाव था। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि दोनों उम्मीदवारों का जन्म केरल में नहीं हुआ था। थरूर का जन्म लन्दन में हुआ था जहाँ उनके पिता एक अखबार में काम करते थे। चंद्रशेखर का जन्म अहमदाबाद में हुआ था. उनके पिता भारतीय वायुसेना में अधिकारी थे तथा उस समय अहमदाबाद में नियुक्त थे। दोनों ही परिवार नायर समुदाय के थे तथा दोनों की जड़ें राज्य के पल्कड़ जिले से जुडी हुई थी। दोनों उम्मीदवारों बहुत ही कम समय अपने मूल राज्य में गुजारा। यह चुनाव इतना कांटे का था कि शशि थरूर कुल 16,000 मतों से चुनाव जीते।
इस राज्य में बीजेपी में काफी समय से गुटबंदी चली आ रही है। केंद्रीय नेताओं की कोशिशों के बावजूद यह स्थिति सुधर नहीं पाई। सो इस बार पार्टी की आला कमान ने एक नया कदम उठाया तथा और चंद्रशेखर को राज्य पार्टी का अध्यक्ष नियुक्त करने का फैसला किया। चंद्रशेखर का आई टी का लम्बा चौड़ा व्यवसाय है जो विदेशों में भी फैला हुआ है। जिस दिन उन्हें पार्टी अध्यक्ष चुनाव लड़ने के लिए नामांकन भरने को कहा गया उस समय वे विदेश यात्रा की तैयारीकर रहे थे। अपने स्तर में वे यह जिम्मेदारी नहीं लेना कहते थे क्योंकि इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए बहुत समय देना पड़ता जिससे उनका व्यवसाय प्रभावित होता था। बताया जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनको यह जिम्मेदारी देना चाहते थे और उन्होंने गृहमंत्री अमित के जरिये यह सन्देश भिजवाया कि उन्हें यह जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी। उनका कहना था कि केवल उनके नेतृत्व में पार्टी इस राज्य में अपनी जड़ें जमा सकती है।
यह कहा जा रहा है कि इस राज्य में उनकी छवि एक साफ सुथरे नेता कि है। उनकी सोच और काम करने का तरीका बहुत प्रभावी है। राज्य की राजनीति पिछले में कुछ दशकों से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी नीत वाम मोर्चे और कांग्रेस नीत लोकतान्त्रिक मोर्चे में बंटी हुई है.दोनों गठबंधन बारी बारी से सत्ता में आते रहे हैं। लेकिन पिछले विधानसभा चुनावों में वाममोर्चा लगातार दूसरी बार सत्ता में आया। मजे की बात यह है कि पहले 2019 और बाद में 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस राज्य ने लगभग सभी सीटों पर जीती। बीजेपी इस बार नायर समुदाय पर नज़र रख रही है। उसे ईसाई मत भी मिलने की उम्मीद है। ऐसा माना जाता है एक बड़ा समुदाय मछुआरा भी इस बार बीजेपी के साथ जा सकता है। चंद्रशेखर का पहला लक्ष्य स्थानीय चुनावों में पार्टी का बल दिखना है। इसके अनुरूप ही अगले साल होने वाले विधान सभा चुनावों की रणनीति बनायेगी।